आचार्य बालकिशन नहीं असली गुनाहगार तो कांग्रेसी है,, आइये आपको सच्चाई बताते है की कोंग्रेस ने ऐसे लोगो को अपना सांसद बनाया है जिनपर हत्याओं के केस दर्ज है,,, असली अभियुक्त तो यह कांग्रेसी है जो देश बेचने के लिए तैयार है,,,,,,,,नीचे लिखे रिपोर्ट को पढ़िए असाम के तेजपुर में जो सांसद रहे है उनपर सी बी आई ने दो साल पहले जांच की वह पुरी तरह से फर्जी निकला लेकिन आज तक कोई कार्यवाही नहीं की गयी, बल्कि उसे २००९ में दोबारा कांग्रेस ने टिकेट दी,जरुरत पड़े तो इटली कि के जी बी की agent सोनियाएंटोनियो को कांग्रेस राजमाता बना सकती है,,,,,,,,,आई एस आई के लोगो को, तक को कांग्रेस अपना उम्मीदवार बना सकती है,,,,,,,,,,,,,,,,,,,ढाई करोड़ बंगला देशियो को वोट के लिए पास पोर्ट व राशन कार्ड दे सकती है,,,,,,,,सुब्बा जैसे अपराधियों को सांसद बना सकती है,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,आज तक सुप्रेम कोर्ट के बार बार कहने पर सुब्बा के खिलाफ जिसपर २५ हज़ार की कर चोरी का इलज़ाम है,,,जो लोटरी माफिया है,,,,,,,,,,,,,,,जो आसाम का सबसे धनी सांसद है,,,,,,,,,,,,,,,,,,से सभी कोंग्र्स्सी पैसे खाते है,,,,,,,,,,,,,,,,
सी बी आई व कोंग्रेस की सचाई जाने,,,,,,,,,,
दूसरो को भी भेजे,,,,,,,,सबको मेल करे,,,,,,,,,,,,,,,,
[LARGE][LINK=/index.php/yeduniya/326-2011-07-28-12-15-08]सुब्बा पर करम, बालकृष्ण पर सितम क्यों? [/LINK] [/LARGE]
Written by डा. आशीष वशिष्ठ Category: [LINK=/index.php/yeduniya]सियासत-ताकत-राजकाज-देश-प्रदेश-दुनिया-समाज-सरोकार[/LINK] Published on 28 July 2011 [LINK=/index.php/component/mailto/?tmpl=component&template=youmagazine&link=3d0f731a70bfba02084b67ce5984ad0742782eec][IMG]/templates/youmagazine/images/system/emailButton.png[/IMG][/LINK] [LINK=/index.php/yeduniya/326-2011-07-28-12-15-08?tmpl=component&print=1&layout=default&page=][IMG]/templates/youmagazine/images/system/printButton.png[/IMG][/LINK]
बाबा रामदेव के सहयोगी आचार्य बालकृष्ण पर सीबीआई का शिकंजा धीरे-धीरे कसता चला जा रहा है। सीबीआई ने बालकृष्ण के खिलाफ धारा 420 (ठगी), 120 बी (आपराधिक षड्यंत्र) के तहत मामला दर्ज किया है। उनके खिलाफ फर्जी डिग्री और भारतीय पासपोर्ट अधिनियम की धारा 12 के उल्लंघन के तहत भी मामला दर्ज किया गया है। बालकृष्ण को लेकर जिस तरह से सीबीआई की तेजी और फुर्ती वाकया ही काबिले तारीफ कहा जा सकता है। लेकिन अधिकतर मामलों को सालों-साल टालने वाली सीबीआई में अचानक आई फुर्ती की वजह किसी से छिपी नहीं है।
कालेधन और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार को घेरने की मुहिम के मुखिया बाबा रामदेव के दाहिने हाथ माने जाने वाले बालकृष्ण पर सीबीआई का शिकंजा लगभग कस चुका है। सूत्रों की माने तो सीबीआई कभी भी उन्हें गिरफ्तार कर सकती है। हालांकि बालकृष्ण अण्डर ग्राउण्ड चल रहे हैं और बालकृष्ण के अंगरक्षक जयेंद्र सिंह असवाल ने हरिद्वार के कनखल थाने में उनकी गुमशुदगी की रपट दर्ज कराई है। लेकिन जो तेजी और कार्य कुशलता सीबीआई बालकृष्ण के मामले में दिखा रही है, उसी से कहीं ज्यादा गंभीर आरोप असम से कांग्रेस के पूर्व सांसद एम. के. सुब्बा पर हैं। कांग्रेसी सांसद सुब्बा की भारतीय नागरिकता पर सवाल उठाते हुए सीबीआई चार्जशीट तक दायर कर चुकी है। इसके बावजूद सिर्फ एफआईआर के बाद बालकृष्ण का पासपोर्ट रद्द कराने पर आमदा सीबीआई ने सुब्बा का पासपोर्ट रद्द कराने की कोई कोशिश नहीं की है। इससे सीबीआई ने साबित कर दिया है कि वह स्वतंत्र जांच एजेंसी नहीं, बल्कि केंद्र सरकार के इशारे पर काम करने वाला संगठन है।
गौरतलब है कि काले धन और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर केंद्र की संप्रग सरकार को योग गुरू रामदेव और आचार्य बालकृष्ण ने बड़े जोर-शोर से घेरा था। 4-5 जून की रात को बाबा रामदेव और उनके सर्मथकों पर डंडे बरसाकर संप्रग सरकार खुद को फ्रंटफुट पर मान रही है। बाबा रामदेव के उठाए सवालों का जवाब और कोई कार्रवाई करने की बजाय कांग्रेस ने ये ठान लिया कि वो रामदेव को भी अपने स्तर पर लाकर ही दम लेगी अर्थात उन्हें और उनके सहयोगियों को भी भ्रष्ट साबित करके छोड़ेगी। इसी कड़ी में रामदेव और बालकृष्ण पर सरकार की नजरें टेढ़ी हैं। लेकिन नागरिकता, फर्जी डिग्रियों संबंधी जो भी केस बालकृष्ण पर दर्ज करके सीबीआई उनके खिलाफ लुक आउट नोटिस जारी कर दिया है और विदेश मंत्रालय से बालकृष्ण के पासपोर्ट को रद्द करने की मांग की है, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि सीबीआई किसी दबाव या इशारे पर काम कर रही है।
नागरिकता के मामले में बालकृष्ण से कहीं ज्यादा गंभीर आरोप असम से कांग्रेस के पूर्व सांसद एम. के. सुब्बा पर हैं। कांग्रेसी सांसद सुब्बा की भारतीय नागरिकता पर सवाल उठाते हुए सीबीआई चार्जशीट तक दायर कर चुकी है। इसके बावजूद सिर्फ एफआईआर के बाद बालकृष्ण का पासपोर्ट रद्द कराने पर आमदा सीबीआई ने सुब्बा का पासपोर्ट रद्द कराने की कोई कोशिश नहीं की है। सीबीआई की चार्जशीट के बावजूद सुब्बा न सिर्फ अपना बिजनेस आराम से चला रहे हैं, बल्कि एक पूर्व सांसद को मिलने वाले सुविधाओं का लाभ भी ले रहा है। इस मामले में सीबीआई का दोहरापन इस बात से भी साफ हो जाता है कि बालकृष्ण के फर्जी पासपोर्ट में तत्काल कार्रवाई शुरू हो गई लेकिन सुब्बा के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने में एक दशक से भी ज्यादा समय लग गया। लंबे समय तक सुब्बा के मामले में निष्क्रिय रहने पर सीबीआई को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गंभीरता से जांच शुरू करनी पड़ी। बाद में अदालत के निर्देश पर ही उसने चार्जशीट भी दाखिल की।
सीबीआई ने अभी तक बालकृष्ण की भारतीय नागरिकता पर उंगली नहीं उठाई है। उनपर केवल पासपोर्ट ऑफिस में जमा की गई शैक्षिक डिग्रियों के फर्जी होने के प्रमाण हैं। यहां सवाल यह नहीं है कि सीबीआई बालकृष्ण के पीछे क्यों पड़ी है, हां अगर बालकृष्ण ने सच्चाई को छुपाया है या दस्तावेजों से हेराफेरी करके पासपोर्ट या अन्य सुविधाएं प्राप्त की हैं तो उन पर कार्रवाई अवश्य होनी चाहिए। लेकिन इन सब के बीच एक बात जो अखरती है वो यह है कि क्या केवल बालकृष्ण ही एकमात्र ऐसे गुनाहगार हैं। नागरिकता के मामले से लेकर फजी पासपोर्ट के कई अन्य मामले सरकार के संज्ञान में है लेकिन उन केसों पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं होती, ऐसे हालातों में ये लगता है कि सरकार जान बूझकर कानून की आड़ लेकर निजी स्वार्थ, खुन्नस और बदला लेने की भावना से बालकृष्ण के विरूद्व कार्रवाई करवा रही है।
सीबीआई का चाहे जितनी बार स्वतंत्र जांच एजेंसी का तमगा दिया जाए लेकिन उसकी कार्यशैली और व्यवहार हर बार यही सिद्व करता है कि वो दिल्ली की गद्दी काबिज दल की गुलाम से अधिक नहीं है। पीएम और गृहमंत्री के इशारे पर सीबीआई हर मामले को अंजाम देती है और अगर ऊपर से हरी झंडी नहीं है तो संगीन से संगीन मामलों में जानबूझकर देरी और लटकाने का रवैया अपनाया जाता है। आज संप्रग सरकार के सबसे धड़े कांग्रेस के पूर्व सांसद सुब्बा के मामले को जिस तरह से सीबीआई दबा कर बैठी है, उससे यही प्रतीत होता है कि बिना सरकार के इशारे के स्वतंत्र जांच एजेंसी का दम ठोंकने वाली सीबीआई दो कदम चलने को मोहताज है। बात तो तब है जब सीबीआई या अन्य जांच एजेंसिया छोटे-बडे़, अपने-पराये, अमीर-गरीब में बिना किसी भेदभाव के निष्पक्ष तरीके से कार्रवाई करें। विपक्ष वैसे भी सीबीआई को कांग्रेस ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टीगेशन ही कहता है। अगर बालकृष्ण दोषी हैं तो उन्हें सजा जरूर मिलनी चाहिए लेकिन वहीं सीबीआई के पास पेडिंग पड़े मामलों को इसी तत्परता से निपटाए तो अपराधियों का हौंसला गिरेगा और आम आदमी का पुलिस-प्रशासन पर भरोसा बढे़गा।
[B]लेखक डा. आशीष वशिष्ठ लखनऊ में स्वतंत्र पत्रकार हैं.[/B]
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सांसद सुब्बा भारतीय नागरिक नहीं: सीबीआई | सांसद सुब्बा भारतीय नागरिक नहीं: सीबीआई |
28 अप्रैल 2008
सीएनएन-आईबीएन
नई दिल्ली। केन्द्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने सोमवार को उच्चतम न्यायालय को बताया कि कांग्रेसी सांसद एम.के. सुब्बा द्वारा चुनाव आयोग कार्यालय में दिया गया जन्म प्रमाण-पत्र फर्जी है।
ज्ञात हो कि कांग्रेसी सांसद सुब्बा अपनी नागरिकता को लेकर लम्बे अर्से से संदेह के घेरे में हैं।
सीबीआई ने अदालत में कहा कि सुब्बा, जो असम के तेजपुर से सांसद हैं, ने चुनाव आयोग को फर्जी प्रमाण-पत्र जमा किए। साथ ही इन कागजातों में आधारहीन जानकारी दाखिल की गई है।
अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुब्बा को जवाब दाखिल करने के लिए छह हफ्तों की मोहलत दी है।
मोनी कुमार कांग्रेस का ‘मनीबैग’
सीएनएन-आईबीएन ने पिछले साल लगातार खबरें दिखाई थी और यह खुलासा किया था कि किस तरह से असम के ‘लॉटरी सामंत’ एम.के. सुब्बा ने अपना जन्म स्थान छुपाया है। सुब्बा पर आरोप है कि वे एक नेपाली नागरिक हैं। साथ ही सुब्बा एक नेपाली नागरिक की हत्या के दोषी भी हैं।
सीएनएन-आईबीएन के विशेष जांच दल ने यह खुलासा किया था कि मोनी कुमार सुब्बा नेपाल से भागकर आए हैं और यहां आने के बाद उन्होंने अपनी पहचान छुपा रखी थी। उन्होंने अपना नाम मणि राज लिम्बो से बदलते हुए मोनी कुमार सुब्बा कर लिया था।
लिम्बो नहीं, मोनी कुमार सुब्बा हूं
लेकिन सांसद महोदय बार-बार यही दावा कर रहे हैं कि उनका जन्म दार्जिलिंग में हुआ है और उनके माता-पिता सिक्कम से यहां आए थे।
सुब्बा से संबंधित ऐसी खबरें सामने आने के बाद सीबीआई ने सीएनएन-आईबीएन से इस मामले की जांच के लिए सबूत मांगे थे और जांच शुरु कर दी थी।
सुब्बा मामला: सीबीआई को मोहलत
असम के सबसे धनी प्रत्याशी हैं सुब्बा
इतना ही नहीं पूर्वोत्तर असम की तेजपुर संसदीय सीट को बरकरार रखने के लिए मैदान में उतरे सुब्बा का लगभग एक अरब रुपये का बीमा है।
अपने नामांकन के समय प्रस्तुत शपथ पत्र में सुब्बा ने अपनी संपत्ति का ब्योरा दिया है जिसमें 56 करोड़ रुपये का निवेश और नकदी दिखाई गई है। इस राशि में से अधिकांश शेयर बाजार में निवेश की गई है।
सुब्बा और उनकी दोनों पत्नियों ज्योति लिंबू और तिलमाया चोंग के पास कुल मिलाकर 1.85 करोड़ रुपये मूल्य के सोने और हीरे के जेवरात हैं।
सुब्बा ने आईएएनएस से कहा, "मुझे यकीन है कि मैं जीत हासिल करूंगा क्योंकि मेरे लोकसभा क्षेत्र के लोग मुझसे स्नेह करते हैं और मैंने क्षेत्र के समग्र विकास के लिए काम किया है।"
उल्लेखनीय है कि सुब्बा की नागरिकता के संबंध में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) इस समय जांच कर रही है।
यह जांच उत्तर प्रदेश के नोएडा निवासी बिरेंद्र नाथ सिंह द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर की जा रही है। सिंह ने आरोप लगाया था कि सुब्बा नेपाली नागरिक हैं और हत्या के मामले में सजायाफ्ता भी हैं।
सुब्बा ने 12 वीं लोकसभा के लिए अपने नामांकन में अपना जन्म स्थान तेजपुर व जन्मतिथि 16 मार्च 1951 बताई थी जबकि 14 वीं लोकसभा के नामांकन में उन्होंने अपना जन्मस्थान दार्जीलिंग (पश्चिम बंगाल) व जन्मतिथि 16 मार्च 1958 दर्शाई थी।
सांसद सुब्बा का जन्म प्रमाणपत्र फर्जी
नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]। नागरिकता विवाद में फंसे सांसद मणिकुमार सुब्बा की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। केंद्रीय जांच ब्यूरो [सीबीआई] ने सुप्रीमकोर्ट में कहा है कि सुब्बा द्वारा उपलब्ध कराए गए जन्म संबंधी दस्तावेज असली नहीं हैं। उसने यह बात सुप्रीमकोर्ट में दाखिल अपनी रिपोर्ट में कही है। कोर्ट ने सुब्बा को इस रिपोर्ट का जवाब देने का निर्देश दिया है।
ब्यूरो ने सुप्रीमकोर्ट के निर्देश पर सुब्बा की नागरिकता मामले की जांच कर यह रिपोर्ट दी है। अब सुब्बा के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है।
गौरतलब है, वीरेन्द्रनाथ सिंह ने सुप्रीमकोर्ट में याचिका दाखिल कर सांसद सुब्बा की नागरिकता पर सवाल उठाया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि सुब्बा भारतीय नागरिक नहीं हैं, बल्कि मणिराज लिंबो नाम के नेपाली नागरिक हैं। वह एक आपराधिक मामले में नेपाल की अदालत से दोषी करार दिए जा चुके हैं और बाद में भाग कर भारत आ गए। आरोप है कि उन्होंने भारत आकर अपना नाम मणिराज लिंबो से बदल कर मणिकुमार सुब्बा कर लिया है। याचिका में कोर्ट से जांच करा सुब्बा की पहचान पता लगाने की मांग की गई है। इन आरोपों पर ही सुप्रीमकोर्ट ने सीबीआई को मामले की जांच कर रिपोर्ट देने का निर्देश दिया था।
सोमवार को सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने कहा कि सीबीआई ने जांच कर सील बंद लिफाफे में रिपोर्ट दाखिल की है। कोर्ट उस पर संज्ञान ले और रिपोर्ट की प्रति पक्षकारों को उपलब्ध कराई जाए ताकि वे उसका जवाब दे सकें।
मुख्य न्यायाधींश केजी बालाकृष्णन की पीठ ने रिपोर्ट की प्रति तो संबंधित पक्षकारों को नहीं उपलब्ध कराई लेकिन सुब्बा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी से इतना जरूर कहा कि रिपोर्ट उनके मुवक्किल के खिलाफ आई है। पीठ ने कहा, रिपोर्ट का निष्कर्ष यह है कि सुब्बा द्वारा उपलब्ध कराया गया जन्मतिथि प्रमाण पत्र असली नहीं है। अब सुब्बा को इस रिपोर्ट पर जवाब देना है।
| एक सुब्बा पर क्यों मेहरबान है सरकार? |  |  |
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| खबरें | मीडिया डेस्क | बुधवार , 27 जुलाई 2011 |
बाबा रामदेव के सहयोगी बालकृष्ण से कहीं ज्यादा गंभीर आरोप असम से कांग्रेस के पूर्व सांसद एम. के. सुब्बा पर हैं। काँग्रेसी सांसद सुब्बा की भारतीय नागरिकता पर सवाल उठाते हुए सीबीआई चार्जशीट तक दायर कर चुकी है। इसके बावजूद सिर्फ एफआईआर के बाद बालकृष्ण का पासपोर्ट रद्द कराने पर आमदा सीबीआई ने सुब्बा का पासपोर्ट रद्द कराने की कोई कोशिश नहीं की है। इससे सीबीआई ने साबित कर दिया है कि वह स्वतंत्र जांच एजेंसी नहीं, बल्कि केंद्र सरकार के इशारे पर काम करने वाला संगठन है।
सीबीआई ने अभी तक बालकृष्ण की भारतीय नागरिकता पर उंगली नहीं उठाई है। उनपर केवल पासपोर्ट ऑफिस में जमा की गईं शैक्षिक डिग्रियों के फर्जी होने के प्रमाण हैं। वहीं, सुब्बा के मामले में सीबीआई ने अदालत में चार्जशीट दाखिल कर उनके भारतीय नागरिक नहीं होने का प्रमाण पेश किया है। इसके बावजूद आज तक सीबीआई ने सुब्बा का पासपोर्ट रद्द करने के लिए विदेश मंत्रालय से अनुरोध करने की जरूरत नहीं समझी।
सीबीआई की चार्जशीट के बावजूद सुब्बा न सिर्फ अपना बिजनेस आराम से चला रहे हैं, बल्कि एक पूर्व सांसद को मिलने वाले सुविधाओं का लाभ भी ले रहा है। इस मामले में सीबीआई का दोहरापन इस बात से भी साफ हो जाता है कि बालकृष्ण के फर्जी पासपोर्ट में तत्काल कार्रवाई शुरू हो गई लेकिन सुब्बा के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने में एक दशक से भी ज्यादा समय लग गया। लंबे समय तक सुब्बा के मामले में निष्क्रिय रहने पर सीबीआई को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गंभीरता से जाँच शुरू करनी पड़ी। बाद में अदालत के निर्देश पर ही उसने चार्जशीट भी दाखिल की।Related items |
Sunday, May 4, 2008
सांसद सुब्बा की जेल यात्रा तय डेटलाइन इंडिया
नई दिल्ली, 4 मई-कांग्रेस सांसद मणि कुमार सुब्बा का जालसाजी और देशद्रोह के आरोप में जेल जाना तय है। देखना यह है कि असम, बंगाल, दिल्ली और अन्य प्रदेशों के कितने बड़े नेता और बहुत बड़े और वर्तमान और भूतपूर्व अधिकारी इस जाल में फंसते हैं।
मणि कुमार सुब्बा को सीबीआई की खोज रपट का जवाब अगले एक महीने में देना है लेकिन वे मीडिया के जरिए सीबीआई को गालियां देने पर तुल गए है। एक एनआरआई द्वारा चलाई जा रही न्यूज एजेंसी का इस्तेमाल करके सुब्बा ने कहा कि उन पर नेपाल के जिस अपराधी मणि कुमार लिंबो होने का आरोप लगाया जा रहा है वह आदमी 1982 तक नेपाल की जेल में था और आज भी जिंदा है। सीबीआई के अधिकारी कांग्रेस सांसद सुब्बा के इस विचित्र बयान पर दुखी हैं और चकित भी। उनका सवाल है कि अगर सुब्बा को इतने वर्षो से यह जानकारी थी तो वे अपने बचाव में अब जा कर क्यों बोल रहे हैं। सीबीआई के एक अधिकारी के मुताबिक उन्हें कोई आश्चर्य नहीं होगा कि सुब्बा अपने पैसे के दम पर नेपाल का कोई भूतपूर्व अपराधी मणि कुमार लिंबो बना कर खड़ा कर दें और अगर उन्होंने ऐसा किया तो उन पर जालसाजी का मुकदमा और गंभीर हो जाएगा। इस बीच सुब्बा की कई पत्नियों में एक ने भी उनके खिलाफ बयान दे दिया है और सर्वोच्च न्यायालय ने सुब्बा के चुनाव क्षेत्र असम के तेजपुर से एक और याचिका जामिनी कुमार वैश्य ने डाली है जिसके अनुसार सुब्बा का व्यक्तित्व शुरू से आखिर तक फर्जी है। उनके जन्म प्रमाण पत्र, तथाकथित शिक्षा रिकॉर्ड और बार बार बदलते रहे इसका सुबूत है। वैश्य की याचिका में कहा गया है कि मतदाता सूची में सुब्बा का नाम भी जाली है। तेजपुर के जिस मतदान केंद्र नंबर 21 पर सुब्बा का नाम सूची में होना बताया गया है वह चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार 537 नंबर पर खत्म हो जाती है लेकिन सुब्बा का मतदाता नंबर 630 है। याचिका के अनुसार 28 अगस्त 1971 को अपनी चचेरी बहन काली माई की हत्या के आरोप में केस नंबर 201 में उम्रकैद की सजा दी गई थी। तेपलेजुम जिला अदालत द्वारा दी गई सजा की पुष्टि 29 नवंबर 1972 को नेपाल के सर्वोच्च न्यायाल ने कर दी थी और बाद में नेपाल नरेश के पास अपील की गई थी जो नामंजूर हो गई थी।
सीबीआई के अनुसार सुब्बा और लिंबो नेपाल की ईलाम जेल से ईलाम अस्पताल ले जाते वक्त फरार हो कर भारत आ गया इस बात की पुष्टि सुब्बा की दूसरी पत्नी कर्मा कनु ने भी की है। सुब्बा के भाई संजय राज सुब्बा ने माफी की अपील नेपाल नरेश के पास की थी और यही यह बताने के लिए काफी है कि मणि कुमार लिंबो एक ही व्यक्ति हैं। इसके अलावा सुब्बा पर नागालैंड, असम और मेघालय लॉटरियों के कुल मिला कर 25 हजार करोड़ रुपए और उत्तर प्रदेश में 35 सौ करोड़ रुपए व्यापार के टैक्स के तौर पर हजम कर जाने का आरोप है।
सुब्बा ने लोकसभा का नामंकन करते समय अपनी हैसियत सिर्फ 20 करोड़ रुपए की बताई है, जबकि सिर्फ उसका दिल्ली का फार्महाउस दो सौ करोड़ का है। कांग्रेस में सुब्बा के खिलाफ आवाज उठनी शुरू हो गई है। असम के गृह मंत्री ने उनका इस्तीफा मांगा है और आज उनके इलाके तेजपुर में उनके पुतले जलाए गए। सुब्बा बहुत बड़ी आफत में हैं और देखना यह है कि वे अपने साथ कितने अधिकारियों और राजनेताओं को ले कर डूबते हैं।