अण्डमान निकोबार और सेल्यूलर जेल की यात्रा
आज दिनाँक 14 जुलाई को अण्डमान निकोबार की यात्रा पर कोलकाता से चलकर पहुँचे गोवा की उड़ान से 9:25 पर कोलकाता से चले तथा 11:25 पर वीर सावरकर हवाई अड्डे पर पहुँचे प्लेन से बाहर निकलते ही तेज हवाओं ने स्वागत किया तेज हवायें चेहरे से टकराती, एक बार जी तो लगा कि यह प्लेन के इंजन की अवाज है प्लेन का इंजन बहुत तेज हवा फेंकता है परन्तु वह पिछले दरवाजे पर फेंकता है, मैं आगे वाले दरवाजे पर था। ध्यान से देखने पर पता चला कि यह तेज भगवान का पंखा चल रहा है। एयरपोर्ट के चारों ओर पहाड़ियाँ थी, 25 मिनट सामान लेने में लगी, उसके बाद समिति के कुछ भाई-बहन एयरपोर्ट पर आये थे, एयरपोर्ट ‘‘भारत माता की जय’’ तथा ‘‘वन्दे मातरम्’’ के नारों से गूंज उठा।
वहाँ से सेल्यूलर जेल गये जो हमारे क्रान्तिकारियों का तीर्थस्थल है। सेल्यूलर जेल में शहीद स्मारक पर पुष्प गुच्छ भेंट कर शहीदों को नमन किया। दोपहर बाद तुरन्त बैठक थी। अतः सेल्यूलर जेल को देखने का प्रोग्राम कल पर स्थगित करके वो सेल्यूलर के ही एक हाल में 9 अगस्त, 2012 के आन्दोलन के लिए बैठक की, लगभग 150 लोग बैठक में थे, बैठक में वहाँ के सांसद श्री विष्णु पद रामजी भी आये, बैठक में प्रतिभागियों को 9 अगस्त के उद्देश्य व लक्ष्य के बारे में बताया, सायं 5 बजे प्रेस-कॉन्फ्रेंस की गयी, बैठक में बहुत से व्यक्तियों ने वहाँ आने के लिए सहमति दी, बैठक में सभी को याद दिलाया गया कि वह सब क्रान्तिकारियों के शहीदों के वंशज हैं उनके पूर्वजों का जिन्होंने देश की रक्षा के लिये अपना जीवनदान और जवानी कुर्बान कर दी, जिन्होंने अपना पसीना ही नहीं, खून अण्डमान की मिट्टी में जिस उद्देश्य के लिए बहाया था वह अभी अधूरा है, वह पूर्वजों का तप था, उन्हें याद करते हैं, याद करने से उनको शान्ति नहीं मिलेगी, बल्कि उनकी शान्ति के लिए उनके अधूरे कामों को पूरा करने से मिलेगी, सभी ने जोश, उत्साह के साथ दिल्ली आने का आश्वासन दिया।
उसके बाद शाम को राजीव गांधी क्रिड़ा विहार देखने गये वहाँ पर समुद्र के बीच में जैसे USA में स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी है वैसे ही राजीव का स्टेच्यू लगया गया है उसमें राजीव गांधी हाथ में माला लेकर ऐसे लहरा रहा है जैसे अभी जेल से देश सेवा का कोई बड़ा काम करके निकले हैं, पता चला कि यह मूर्ति 2009 में सोनिया गांधी ने लगवायी है इस पर 10 करोड़ रुपये की लागत आयी है, राजीव गांधी कभी जेल नहीं गया, सादा सत्ता और राजसी सुख भोगा, जिसने शान्ति का नोवेल पुरस्कार की चाह श्रीलंका में शान्ति सेना भेजी, उसने बस जीवन में एक भी अच्छा काम किया कि उसने स्वीकार किया कि भारत में 100 में 15 पैसे ही विकास के लिये पहुँचते हैं बाकी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। उसके नाम पर सेल्यूलर जेल के ठीक सामने खेल स्टेडियम का नामकरण हुआ है, वीर सावरकर के नाम पर नहीं, नेता जी के नाम पर नहीं जिन्होंने उसे आजाद करवाया।
राजीव गांधी तो क्या उनके पिताजी या नाना जी ने भी कभी सेल्यूलर जेल नहीं देखी, यदि उन्होंने कभी अंग्रेजों का विरोध किया होता, अगर अंग्रेजों को उनसे खतरा होता तो गांधी जी व नेहरु को अण्डमान भेजते, लेकिन अंग्रेजों को पता था कि इनसे हमें कोई खतरा नहीं इसलिए कभी भी कालापानी न भेजकर इनको महलों या आलीशान जेलों में रखा। उनके नाम पर नामकरण देखकर दिल को ठेस लगी, जब हम जेल के बाद समुद्र तट पर गये तो देखा कि नेताजी की एक बड़ी मूर्मि लगी है वहाँ पर आये-गये और माल्यार्पण किया तो वहाँ का एक योग शिक्षक बड़ी दुखी आवाज में कहने लगा कि मेरा दिल 23 जनवरी को बड़ा दुखी होता है! जब पोर्ट ब्लेयर की पुलिस यहाँ पर 26 जनवरी के लिए परेड करती है। वह एल.जी. (लेफ्टीनेंट-गर्वनर) को तो सलामी देती है, लेकिन नेताजी की मूर्ति को एक बार भी सलामी नहीं देती, वो तो सेना नायकों के नायक थे। 23 जनवरी को उनका जन्मदिन है वह यदि एक बार भी परेड करते हुए, गुजरते हुए सलामी दे दें तो उनका क्या बिगड़ेगा।
अण्डमान का अन्तिम बिन्दु है-उसके बाद बर्मा वहाँ से 170 किमी. दूर है उस प्वाइन्ट पर एक बार इन्दिरा जी गयी हैं तो उसका नाम इन्दिरा प्वाइन्ट रख दिया गया। वीर सावरकर से लेकर अनेकों कैदियों ने 30 साल यहाँ पर गुजारे हैं, लेकिन उनका एक भी कोई नामकरण नहीं किया। पहली बार मोरारजी देसाई यहाँ पर आये, लेकिन पण्डित नेहरु एक बार उस क्रान्ति के तीर्थ में नमन करने नहीं आये, जो बलिदान की भूमि है।
सेल्यूलर जेल को बचाने के लिए व उसको स्मारक बनाने के लिए अण्डमान के स्वतन्त्रता सेनानियों ने कमेटी बनाकर बार-बार नेहरु को कहा उसने नहीं सुनी, उसके बाद इन्दिरा जी को कहा व बार-बार मिले लेकिन उन्होंने भी कोरा आश्वासन ही दिया, जेल को स्मारक बनाने का काम मोरारजी देसाई ने किया, वह आये और जेल को राष्ट्र के प्रति समर्पित किया। सायं को हम नेताजी की प्रतिमा पर फिर गये, सायं को हल्की-हल्की बारिश शुरु हो गयी इसी स्थान पर कुछ साल पहले सुनामी आयीं थीं तथा अण्डमान में बड़ी तबाही लायीं थीं, लाखों व्यक्ति मारे गये थे, हमारे राज्य प्रभारी देवयोग से बच पाये थे।
वहीं से सामने रासद्वीप दिखाई दे रहा था जो एक छोटा सा हरा-भरा टापू है, जिस पर अंग्रेज कमीश्नर व बड़े अधिकारी रहते थे। जो अब नौसेना के अधीन है वहाँ पर कहते हैं कि मच्छर नहीं हैं और अण्डमान में मच्छरों की भरमार है लेकिन उस द्वीप पर एक भी मच्छर नहीं, साथ ही वह उनके लिये कैदियों के विद्रोह से सुरक्षित भी था।
अगले दिन सुबह हम एक ब्रिज (पुल) पर गये वहाँ पर योग-प्राणायाम किया सुबह ब्रिज (पुल) पर घूमना स्वर्ग के समान सुख-दायक है। वहाँ से 8:30 पर आकर रास आईलैण्ड पर गये वहाँ जाने के लिए हमारे सरकारी आवास के सामने से बोट मिलती थी जो 10 मिनट में वहाँ पर उतार देती है, हम वहाँ पर गये जाते ही नारियल पानी पिया। वहाँ हिरन और मोर प्रचुर मात्रा में हैं हिरन बिस्कुट तथा नारियल की गिरी खाने के लिए बिल्कुल पा आ जाते हैं।
रासद्वीप पर ही 100 वर्ष पुराने अंग्रेजों के बंगले, चर्च व कब्रिस्तान आदि के खण्डहर हैं सभी खण्डहरों पर सैकड़ों वर्ष पुराने पीपल के पेड़ों ने अपनी जड़ें फैलाकर अपने आक्रोश में ले लिया मानो कह रहे हो कि तुम्हारे अत्याचार का अन्त हो चुका हो। विशेष वहाँ पर अंग्रेजों का कब्रिस्तान है जहाँ पर 100-125 वर्ष पहले के अधिकारी जो क्रान्तिकारियों पर अत्याचार करते थे उनकी कब्रों पर लाईट जल रही थी, ऐसा लगता था कि सरकार ने 2-3 वर्ष पहले से ही वहाँ पर लाईटें लगवा दी थी।
उसकी फोटो ली व देखकर दुख हुआ, उन विदेशियों की कब्रों पर तो यह सरकार दिये जलाती है लेकिन अपने क्रान्तिकारियों को भुलाती है, शहीदों ने तो सोचा था कि शहीदों की चिताओं पर हर बर्ष मेले लगेंगे, लेकिन यहाँ पर तो शहीद करने वाले आक्रमणकारियों की चिताओं पर मेले लग रहे हैं। शहीदों को भुलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी होगी।
रास आईलैण्ड पर अंग्रेजों का स्वीमिंग पुल पानी साफ करने की मशीन जो वह खुद पीते थे, क्रान्तिकारियों को गन्दा पानी पिलवाते थे, जिससे कि क्रान्तिकारी बीमार होते थे, उनकी प्रिन्टिंग प्रेस आदि के अवशेष थे, 1943 में जापान ने अण्डमान पर कब्जा किया तो वहाँ पर हजारों की संख्या में बंकर बनवाये वह बंकर अभी शेष है। सायं व दिन में हमने सेल्यूलर जेल में देखा कि कैसे हमारे क्रान्तिकारियों को यातनायें दी जाती थी, कोल्हू में पेरना, बेत लगाना, नारियल कूटना, हाथों में बेड़ी लगाना व पैरों में बेड़ी लगाना जिससे वह चल न सकें। बर्तन के नाम पर लोहे का जंग लगा ऐसा कटोरा जिसको जितना चाहे साफ करो लेकिन वह साफ नहीं हो सकता, सजा के लिये जूट के कपड़े पहनाना, उसके बाद हमने वह स्थान देखा जहाँ फांसी से पहले स्नान व अन्तिम क्रिया करवाते थे।
वीर सावरकर को बिल्कुल तीसरी मंजिल पर अंत में कोठरी दी गयी जहाँ उसके ठीक सामने फांसी घर था, फांसी घर अभी भी वैसी ही अवस्था में है जहाँ एक साथ 3 वीरों को फांसी दी जाती थी, वीर सावरकर को फांसी घर के सामने इसलिए रखा गया कि उसका हौसला टूट जाये लेकिन उसका हौसला टूटने की बजाय बढ़ता गया हर बलिदान पर वह वन्दे मातरम् के नारे के साथ अपने संकल्प को दृढ़ करता था। फांसी घर के ठीक सामने जो पेड़ थे उन पर लाल-लाल सुन्दर-सुन्दर फूल लगे थे, मानो शहीदों का बलिदान उनका भारत माता को चढ़ाया गया रक्त फूलों के रूप में खिल गया हो। जेल के सामने सावरकर पार्क है जिसमें सावरकर की मूर्ति पूजा के लिए एक सामाजिक संस्था ने लगवायी थी कांग्रेस की सरकार ने नहीं। वह रात को अन्धेरे में डूबी रहती है, लेकिन रास आईलैण्ड के विदेशियों के मकबरे रोशनी से नहाते रहते हैं।
फांसी घर के बाद जेल की मीनार में नेहरु के चित्र लगे हुये हैं, मुझे समझ नहीं आया कि नेहरु के चित्र क्यों लगे हैं उसका तो बलिदान से, त्याग से व देशसेवा से दूर-दूर का नाता नहीं था। वह तो कभी भी यहाँ नहीं आया। उसके बाद हम सावरकर जी की तीसरी मंजिल कोठरी में गये वहाँ पर बैठकर 9 अगस्त के आन्दोन की चर्चा की। वहाँ के फर्श पर बैठकर चिन्तन किया, उसी 3 Feet X 7 Feet की कोठरी में जहाँ पर हमारे क्रान्तिकारी ने मात्र दो कम्बलों में, घटिया भोजन को खाते हुए, बदबुदार पानी को पीते हुए, ऐसी सब्जी खाते हुए जिसमें कीड़े-मकौड़े साँप की बोटियाँ निकलती खाल, कोठरी की यातनाएं सहते हुये, कई-कई बार 6-6 महीने एकान्त सहते हुए, भयंकर बुखार में भी काम करते हुए, कोल्हू पेरते हुये, भारत माता के सम्मान व स्वाभिमान के लिए अपना जीवन लगा दिया।
उस खुरदरे फर्श पर, उस कोठरी में जिसके दरवाजे सवा इंच मोटी मजबूत इस्तपात की सलाख से बने थे। हवा के लिये 8 फिट ऊपर 13 Feet X 2 Feet का रोशनदान था, जिसमें सायं 5 बजे से सुबह 8 बजे तक टीन के एक छोटे डिब्बे में मल-मूत्र त्याग करके उसी की बदबु के पास बैठने की मजबूरी होती थी। मिट्टी व कीड़ों वाली रोटी खाकर, जब काम पूरा नहीं होता था तो वह भी नहीं मिलती थी, मात्र 200 ग्राम या 2 कटोरी पके चावल का पानी दिया जाता था ताकि वह मरे भी नहीं और जिन्दा रहे तो तिल-तिल करके, वो सारी यातनाएं स्मरण हो आयी, मन किया कि एक रात सावरकर जी की कोठरी में रहकर भारत माता का चिन्तन करूं। लेकिन यह सम्भव न था।
l उसी इन एक नजदीक के गाँव में गये तथा फिर वहाँ से सायं को एक गाँव के योग कक्षा में गये।
l रात को लाईट व साऊण्ड शो देखा उसमें विस्तार पूर्वक अण्डमान की कहानी कहीं गयी।
अगर भारत को विश्वगुरू बनाना है तो हिन्दुस्तान के हर बच्चे को ‘‘क,ख,ग’’सीखाने से पहले कालापानी दिखाना चाहिये, हर बच्चे को शहीदों के जीवन से परिचय करवाना चाहिये।
l आज की अण्डमान के 10 से ज्यादा द्वीपों के नाम अंग्रेजों के नाम पर रखे गये हैं। जैसे हैवलाव इत्यादि।
l वहाँ का प्रशासन शहीदों की याद को मिटाने में जुटा है वहाँ पर एक आईलैण्ड है जहाँ क्रान्तिकारियों को फांसी दी जाती थी, वहीं पर आईलैण्ड की सरकार ने होटल बनाने के लिए किसी विदेशी कम्पनी को देने की तैयारी कर ली है, भारत स्वाभिमान, अण्डमान उसकी आवाज उठा रहा है।
l अण्डमान में कालेज का नाम नेहरु के नाम पर जो वहाँ पर कभी नहीं आया, वहाँ के अनेकों संस्थानों का नाम महात्मा गांधी के नाम पर रखा गया है।
l अण्डमान में आवास करते हुए लेखक को जब पहले दिन रात को एक बार लाईट चली गयी तो कमरे का दरवाजा खोलना पड़ा तो बहुत से मच्छर आ गये उन्होंने 15 मिनट में ही बहुत सी जगह काट खाया, 10 मिनट में ही अहसास हुआ कि बिना बिजली के क्या होता है हमारे क्रान्तिकारियों ने तो बिना बिजली के मच्छरों में अपने मल-मूत्र के पास पूरी जवानी गुजार दी।
l अगले दिन रात को बिस्तर पर कुछ गिर गया तो सोते समय 4 इंच के मोटे गद्दे पर कुछ चिटियाँ आ गयीं थीं जिन्होंने 1 बजे तक सोने ही नहीं दिया, तो हमारे उत्तर-पूर्व के केन्द्रीय प्रभारी सुब्रतो जी का दरवाजा खटखटाकर मुझे उनके कमरे में जाकर सोना पड़ा।
कुछ मच्छरों, कुछ चिटियों के कारण मुझे जब 4 इंच के गद्दे पर, बेड पर अच्छी बिजली वाले कमरे में 15 मिनट में तकलीफ हुई तो अन्दाजा लगा सकते हैं हमारे क्रान्तिकारियों ने तो काल कोठरी की जेल के खुरदरे फर्श पर जाने कितनी चिटियों ने काटा होगा, जाने कितनी धूप-बरसात सहन की होगी, कितनी यातनायें सही हैं तब हमें आजादी मिली है। उनको मेरा नमन है!
अण्डमान का मौसम समुद्र के किनारे होने से वहाँ पर बरसात खूब होती है और गर्मी भी खूब पड़ती है, सूखी गर्मी नहीं पड़ती चिपचिपी गर्मी पड़ती है उसमें एक-एक पल काटना मुश्किल होता है। हमारे क्रान्तिकारियों को उस समय कई-कई दिन में नहाने दिया जाता था वह भी समुद्र के खारे पानी से, समुद्र का पानी भी बहुत थोड़ी मात्रा में क्योंकि उसको जेल तक ढ़ोकर कौन लाये? कैदियों को समुद्र के पास जाने नहीं देते थे।
समुद्र के पानी में नहाकर हालत बहुत खराब होती थी, क्रान्तिकारियों को कोल्हू पेरना व उतना तेल निकालना जितना एक बैल निकालता था।
(राकेश कुमार)
9760095214
आपको सौ झपकी पूरे टीम को पतंजलि परिबार कामाख्या नगर की ओर से बहित सारे सुभकामनाये।मेरा एक सुझव ।पतञ्जलि ब्रांड बहुत बड़ा है।पदाधिकारी चयन समयपर और कर्तब्यनिस्त इमन्दरके के ऊपर डोमपे।हमारे ओडिसा के गांव में बहुत सारे प्रोब्लेम्स रहती हैं।राज्य स्तरपर कियो ऐसा कार्य नहीं होती है जिसे स्वामीजी की कार्य पूरा हो सके।जिस किडिको पतंजलि की दुकान मिलगया ओ कमसे हट जाता है।
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