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सोमवार, 1 अगस्त 2011

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हर दो-तीन साल बाद 
।। हरिवंश ।।
1962 में चीन आक्रमण के बाद से हर दो-तीन साल बाद केंद्र की सरकार लोकसाख खोने लगती है. डगमगाने-लड़खड़ाने लगती है. यह लगातार हो रहा है. क्या हम भारतीयों में शासन क्षमता नहीं है? या हम चर्चिल के कथन कि आजादी की लड़ाई के नेता-योद्धा गुजर जाने दीजिए, इसके बाद इन भारतीयों की अक्षमता-अयोग्यता से देश बिखर जायेगा, सही सिद्ध करने पर तुले हैं? एक विश्‍लेषण.
भारत के लिए सबसे जरूरी चीज है शासन. वह भी केंद्र का. शासन यानी केंद्र का ताकतवर होना. मधु लिमये जो सत्ता के विकेंद्रीकरण सिद्धांत के पालने में पल कर बड़े हुए, वह भी मानते थे कि मजबूत भारत के लिए दिल्ली का सशक्त होना जरूरी है.
कांग्रेस की लगातार दुर्दशा व राजा द्वारा होनेवाली रोज की फ़जीहत ने केंद्र को सबसे अधिक कमजोर कर दिया है. भारतीय जनता पार्टी, भारत में कांग्रेस का विकल्प नहीं बन पायी. येदियुरप्पा जैसों के पाप भाजपा जैसे दलों को डुबो रहेहैं. इसलिए भारतीय जनता पार्टी सशक्त, सार्थक और समय के अनुरूप विपक्ष की भूमिका में नहीं है, क्योंकि येदियुरप्पा के मेंटर (संरक्षक) भाजपा में बड़े पदों पर हैं. येदियुरप्पा प्रसंग पर भाजपा लोक-लाज छोड़ कर सती होना चाहती है, तो उससे देश का बड़ा नुकसान नहीं. भाजपा भय, भूख और भ्रष्टाचार मिटाने की बात करती है, तो उसके दल में येदियुरप्पा जैसे लोग सदस्य भी नहीं होने चाहिए. पर संकेत है कि वह मुख्यमंत्री पद छोड़ेंगे, तो कर्नाटक भाजपा अध्यक्ष पद चाहिए. इसलिए भाजपा तो भविष्यहीन है, पर कांग्रेस? कांग्रेस का, भारत की मुक्ति के संघर्ष और जन्म से जुड़ाव रहा है. अतीत में यह पार्टी, साझा समाज की अभिव्यक्ति का मंच रही है. अगर वह पार्टी राजा, अमर सिंह जैसों के सवालों से घिर जाये, तो चर्चिल का कहा प्रसंग स्मरण होता है. आजादी मिलनेवाली थी, तब चर्चिल ने कहा था, इस बुजुर्ग पीढ़ी को गुजर जाने दीजिए, फ़िर पाइयेगा कि इस देश को चलाने की क्षमता यहां के लोगों में नहीं है. यह मुल्क टूट और बिखर जायेगा.
राजा ने अदालत में प्रधानमंत्री और चिदंबरम पर जो पलटवार किया है, उसने केंद्र सरकार की साख खत्म कर दी है. कांग्रेस बचाव में कह रही है कि भाजपा पहले येदियुरप्पा की बात करे, उन्हें हटाये. क्या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तुलना येदियुरप्पा से होगी? यह जवाब कांग्रेस भाजपा को दे रही है या देश को? क्या भाजपा और येदियुरप्पा ही देश है? या येदियुरप्पा और भाजपा के बाहर भी भारत है? प्रधानमंत्री की एक छवि रही है. उनकी निजी छवि अब तक बेदाग रही है. पर राजा के सवालों ने वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री पद की संवैधानिक भूमिका, मंत्रिमंडल के सामूहिक दायित्व पर गंभीर सवाल खड़े कर दिये हैं. अगर देश अपने प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री पर यकीन नहीं करेगा, तो किस पर करेगा? याद रखिए, तब के वित्त मंत्री आज के गृह मंत्री हैं. अदालत में कोई प्रधानमंत्री पर सवाल करता है, कोई तत्कालीन वित्त मंत्री को अदालत में घसीटना चाहता है, कोई पूर्व सरकारी सचिव कहता है, मैं जेल में हूं , तो रिजर्व बैंक के गवर्नर सही कैसे हैं? भारत संघ की ताकत के प्रतीक हैं प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री, गृह मंत्री, रिजर्व बैंक के गवर्नर वगैरह. ये पद भी आरोपों के लपेटे में आये, तो भारत संघ की ताकत का क्या होगा? ये पद महज संवैधानिक-कानूनी सत्ता के प्रतीक नहीं हैं. लोकनिगाह में ये सर्वोच्च पद, वैधता खोने लगें, तो भारत का भविष्य क्या होगा?
उधर, कांग्रेस संगठन की हालत और बुरी है. मणिशंकर अय्यर बयान देते हैं कि कांग्रेस सर्कस है. वह ‘24 अकबर रोड’ पुस्तक के लोकार्पण अवसर पर बोल रहे थे. मणिशंकर अय्यर, राजीव गांधी के पारिवारिक मित्र रहे हैं. अफ़सर से वह मंत्री बने. केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने कहा है कि पर्यावरण मंत्री के रूप में वह अपनी सरकार में शिखंडी की भूमिका में थे. दिग्विजय सिंह जैसे नेता नये अवतार में हैं. अगर उस पद का व्यक्ति (जिसमें कभी देश भावी प्रधानमंत्री की छवि देखता था) सड़क पर उतर कर मारपीट करे, तो उस पार्टी के पतन को राष्ट्रीय त्रासदी मान लेनी चाहिए. यही नहीं, कांग्रेस यह भी भूल गयी है कि वह किसी महान परंपरा की देन है (गांधीजी की इच्छानुसार आजादी के बाद अगर भंग होकर लोकसेवक संघ बना होता, तो शायद देश का बड़ा उपकार होता). बड़े कांग्रेसी नेता जब मारपीट करते हैं, तो छोटे कांग्रेसी नेता क्या करेंगे? रांची में कपिल सिब्बल आये थे. आइसा के कुछ नौजवान बाहर उनका विरोध कर रहे थे. उन्हें कांग्रसियों ने बुरी तरह पीटा. क्या सत्तामद में कांग्रेस के लोग न्यूनतम मर्यादा भी भूल रहे हैं? क्या वे विरोध को कुचल देना चाहते हैं? अगर यह रास्ता सही है, तो जिन पुराने बड़े कांग्रेसी नेताओं ने आजादी की लड़ाई में प्रतिकार या विरोध-प्र्दशन को राजनीति के तौर पर कारगर हथियार चुना था, क्या वे सब अपराधी थे? क्या कांग्रेस राजनीति का फ़लसफ़ा (फ़िलासफ़ी) बदलना चाहती है?