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शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

अण्डमान निकोबार और सेल्यूलर जेल की यात्रा


अण्डमान निकोबार और सेल्यूलर जेल की यात्रा

        आज दिनाँक 14 जुलाई को अण्डमान निकोबार की यात्रा पर कोलकाता से चलकर पहुँचे गोवा की उड़ान से 9:25 पर कोलकाता से चले तथा 11:25 पर वीर सावरकर हवाई अड्डे पर पहुँचे प्लेन से बाहर निकलते ही तेज हवाओं ने स्वागत किया तेज हवायें चेहरे से टकरातीएक बार जी तो लगा कि यह प्लेन के इंजन की अवाज है प्लेन का इंजन बहुत तेज हवा फेंकता है परन्तु वह पिछले दरवाजे पर फेंकता हैमैं आगे वाले दरवाजे पर था। ध्यान से देखने पर पता चला कि यह तेज भगवान का पंखा चल रहा है। एयरपोर्ट के चारों ओर पहाड़ियाँ थी, 25 मिनट सामान लेने में लगीउसके बाद समिति के कुछ भाई-बहन एयरपोर्ट पर आये थेएयरपोर्ट ‘‘भारत माता की जय’’ तथा ‘‘वन्दे मातरम्’’ के नारों से गूंज उठा।
        वहाँ से सेल्यूलर जेल गये जो हमारे क्रान्तिकारियों का तीर्थस्थल है। सेल्यूलर जेल में शहीद स्मारक पर पुष्प गुच्छ भेंट कर शहीदों को नमन किया। दोपहर बाद तुरन्त बैठक थी। अतः सेल्यूलर जेल को देखने का प्रोग्राम कल पर स्थगित करके वो सेल्यूलर के ही एक हाल में 9 अगस्त, 2012 के आन्दोलन के लिए बैठक कीलगभग 150 लोग बैठक में थेबैठक में वहाँ के सांसद श्री विष्णु पद रामजी भी आयेबैठक में प्रतिभागियों को 9 अगस्त के उद्देश्य  लक्ष्य के बारे में बतायासायं 5 बजे प्रेस-कॉन्फ्रेंस की गयीबैठक में बहुत से व्यक्तियों ने वहाँ आने के लिए सहमति दीबैठक में सभी को याद दिलाया गया कि वह सब क्रान्तिकारियों के शहीदों के वंशज हैं उनके पूर्वजों का जिन्होंने देश की रक्षा के लिये अपना जीवनदान और जवानी कुर्बान कर दीजिन्होंने अपना पसीना ही नहींखून अण्डमान की मिट्टी में जिस उद्देश्य के लिए बहाया था वह अभी अधूरा हैवह पूर्वजों का तप थाउन्हें याद करते हैंयाद करने से उनको शान्ति नहीं मिलेगीबल्कि उनकी शान्ति के लिए उनके अधूरे कामों को पूरा करने से मिलेगीसभी ने जोशउत्साह के साथ दिल्ली आने का आश्वासन दिया।
         उसके बाद शाम को राजीव गांधी क्रिड़ा विहार देखने गये वहाँ पर समुद्र के बीच में जैसे  USA में स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी है वैसे ही राजीव का स्टेच्यू लगया गया है उसमें राजीव गांधी हाथ में माला लेकर ऐसे लहरा रहा है जैसे अभी जेल से देश सेवा का कोई बड़ा काम करके निकले हैंपता चला कि यह मूर्ति 2009 में सोनिया गांधी ने लगवायी है इस पर 10 करोड़ रुपये की लागत आयी हैराजीव गांधी कभी जेल नहीं गयासादा सत्ता और राजसी सुख भोगाजिसने शान्ति का नोवेल पुरस्कार की चाह श्रीलंका में शान्ति सेना भेजीउसने बस जीवन में एक भी अच्छा काम किया कि उसने स्वीकार किया कि भारत में 100 में 15 पैसे ही विकास के लिये पहुँचते हैं बाकी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। उसके नाम पर सेल्यूलर जेल के ठीक सामने खेल स्टेडियम का नामकरण हुआ हैवीर सावरकर के नाम पर नहींनेता जी के नाम पर नहीं जिन्होंने उसे आजाद करवाया।
           राजीव गांधी तो क्या उनके पिताजी या नाना जी ने भी कभी सेल्यूलर जेल नहीं देखीयदि उन्होंने कभी अंग्रेजों का विरोध किया होताअगर अंग्रेजों को उनसे खतरा होता तो गांधी जी  नेहरु को अण्डमान भेजतेलेकिन अंग्रेजों को पता था कि इनसे हमें कोई खतरा नहीं इसलिए कभी भी कालापानी  भेजकर इनको महलों या आलीशान जेलों में रखा। उनके नाम पर नामकरण देखकर दिल को ठेस लगीजब हम जेल के बाद समुद्र तट पर गये तो देखा कि नेताजी की एक बड़ी मूर्मि लगी है वहाँ पर आये-गये और माल्यार्पण किया तो वहाँ का एक योग शिक्षक बड़ी दुखी आवाज में कहने लगा कि मेरा दिल 23 जनवरी को बड़ा दुखी होता हैजब पोर्ट ब्लेयर की पुलिस यहाँ पर 26 जनवरी के लिए परेड करती है। वह एल.जी. (लेफ्टीनेंट-गर्वनर) को तो सलामी देती हैलेकिन नेताजी की मूर्ति को एक बार भी सलामी नहीं देतीवो तो सेना नायकों के नायक थे। 23 जनवरी को उनका जन्मदिन है वह यदि एक बार भी परेड करते हुएगुजरते हुए सलामी दे दें तो उनका क्या बिगड़ेगा।
       अण्डमान का अन्तिम बिन्दु है-उसके बाद बर्मा वहाँ से 170 किमीदूर है उस प्वाइन्ट पर एक बार इन्दिरा जी गयी  हैं तो उसका नाम इन्दिरा प्वाइन्ट रख दिया गया। वीर सावरकर से लेकर अनेकों कैदियों ने 30 साल यहाँ पर गुजारे हैंलेकिन उनका एक भी कोई नामकरण नहीं किया। पहली बार मोरारजी देसाई यहाँ पर आयेलेकिन पण्डित नेहरु एक बार उस क्रान्ति के तीर्थ में नमन करने नहीं आयेजो बलिदान की भूमि है।
         सेल्यूलर जेल को बचाने के लिए  उसको स्मारक बनाने के लिए अण्डमान के स्वतन्त्रता सेनानियों ने कमेटी बनाकर बार-बार नेहरु को कहा उसने नहीं सुनीउसके बाद इन्दिरा जी को कहा  बार-बार मिले लेकिन उन्होंने भी कोरा आश्वासन ही दियाजेल को स्मारक बनाने का काम मोरारजी देसाई ने कियावह आये और जेल को राष्ट्र के प्रति समर्पित किया। सायं को हम नेताजी की प्रतिमा पर फिर गयेसायं को हल्की-हल्की बारिश शुरु हो गयी इसी स्थान पर कुछ साल पहले सुनामी आयीं थीं तथा अण्डमान में बड़ी तबाही लायीं थींलाखों व्यक्ति मारे गये थेहमारे राज्य प्रभारी देवयोग से बच पाये थे।
           वहीं से सामने रासद्वीप दिखाई दे रहा था जो एक छोटा सा हरा-भरा टापू हैजिस पर अंग्रेज कमीश्नर  बड़े अधिकारी रहते थे। जो अब नौसेना के अधीन है वहाँ पर कहते हैं कि मच्छर नहीं हैं और अण्डमान में मच्छरों की भरमार है लेकिन उस द्वीप पर एक भी मच्छर नहींसाथ ही वह उनके लिये कैदियों के विद्रोह से सुरक्षित भी था।
           अगले दिन सुबह हम एक ब्रिज (पुल) पर गये वहाँ पर योग-प्राणायाम किया सुबह ब्रिज (पुल) पर घूमना स्वर्ग के समान सुख-दायक है। वहाँ से 8:30 पर आकर रास आईलैण्ड पर गये वहाँ जाने के लिए हमारे सरकारी आवास के सामने से बोट मिलती थी जो 10 मिनट में वहाँ पर उतार देती हैहम वहाँ पर गये जाते ही नारियल पानी पिया। वहाँ हिरन और मोर प्रचुर मात्रा में हैं हिरन बिस्कुट तथा नारियल की गिरी खाने के लिए बिल्कुल पा  जाते हैं।
        रासद्वीप पर ही 100 वर्ष पुराने अंग्रेजों के बंगलेचर्च  कब्रिस्तान आदि के खण्डहर हैं सभी खण्डहरों पर सैकड़ों वर्ष पुराने पीपल के पेड़ों ने अपनी जड़ें फैलाकर अपने आक्रोश में ले लिया मानो कह रहे हो कि तुम्हारे अत्याचार का अन्त हो चुका हो। विशेष वहाँ पर अंग्रेजों का कब्रिस्तान है जहाँ पर 100-125 वर्ष पहले के अधिकारी जो क्रान्तिकारियों पर अत्याचार करते थे उनकी कब्रों पर लाईट जल रही थीऐसा लगता था कि सरकार ने 2-3 वर्ष पहले से ही वहाँ पर लाईटें लगवा दी थी।
       उसकी फोटो ली  देखकर दुख हुआउन विदेशियों की कब्रों पर तो यह सरकार दिये जलाती है लेकिन अपने क्रान्तिकारियों को भुलाती हैशहीदों ने तो सोचा था कि शहीदों की चिताओं पर हर बर्ष मेले लगेंगेलेकिन यहाँ पर तो शहीद करने वाले आक्रमणकारियों की चिताओं पर मेले लग रहे हैं। शहीदों को भुलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी होगी।
       रास आईलैण्ड पर अंग्रेजों का स्वीमिंग पुल पानी साफ करने की मशीन जो वह खुद पीते थेक्रान्तिकारियों को गन्दा पानी पिलवाते थेजिससे कि क्रान्तिकारी बीमार होते थेउनकी प्रिन्टिंग प्रेस आदि के अवशेष थे, 1943 में जापान ने अण्डमान पर कब्जा किया तो वहाँ पर हजारों की संख्या में बंकर बनवाये वह बंकर अभी शेष है। सायं  दिन में हमने सेल्यूलर जेल में देखा कि कैसे हमारे क्रान्तिकारियों को यातनायें दी जाती थीकोल्हू में पेरनाबेत लगानानारियल कूटनाहाथों में बेड़ी लगाना  पैरों में बेड़ी लगाना जिससे वह चल  सकें। बर्तन के नाम पर लोहे का जंग लगा ऐसा कटोरा जिसको जितना चाहे साफ करो लेकिन वह साफ नहीं हो सकतासजा के लिये जूट के कपड़े पहनानाउसके बाद हमने वह स्थान देखा जहाँ फांसी से पहले स्नान  अन्तिम क्रिया करवाते थे।
      वीर सावरकर को बिल्कुल तीसरी मंजिल पर अंत में कोठरी दी गयी जहाँ उसके ठीक सामने फांसी घर थाफांसी घर अभी भी वैसी ही अवस्था में है जहाँ एक साथ 3 वीरों को फांसी दी जाती थीवीर सावरकर को फांसी घर के सामने इसलिए रखा गया कि उसका हौसला टूट जाये लेकिन उसका हौसला टूटने की बजाय बढ़ता गया हर बलिदान पर वह वन्दे मातरम् के नारे के साथ अपने संकल्प को दृढ़ करता था। फांसी घर के ठीक सामने जो पेड़ थे उन पर लाल-लाल सुन्दर-सुन्दर फूल लगे थेमानो शहीदों का बलिदान उनका भारत माता को चढ़ाया गया रक्त फूलों के रूप में खिल गया हो। जेल के सामने सावरकर पार्क है जिसमें सावरकर की मूर्ति पूजा के लिए एक सामाजिक संस्था ने लगवायी थी कांग्रेस की सरकार ने नहीं। वह रात को अन्धेरे में डूबी रहती हैलेकिन रास आईलैण्ड के विदेशियों के मकबरे रोशनी से नहाते रहते हैं।
          फांसी घर के बाद जेल की मीनार में नेहरु के चित्र लगे हुये हैंमुझे समझ नहीं आया कि नेहरु के चित्र क्यों लगे हैं उसका तो बलिदान सेत्याग से  देशसेवा से दूर-दूर का नाता नहीं था। वह तो कभी भी यहाँ नहीं आया। उसके बाद हम सावरकर जी की तीसरी मंजिल कोठरी में गये वहाँ पर बैठकर 9 अगस्त के आन्दोन की चर्चा की। वहाँ के फर्श पर बैठकर चिन्तन कियाउसी 3 Feet X  7 Feet की कोठरी में जहाँ पर हमारे क्रान्तिकारी ने मात्र दो कम्बलों मेंघटिया भोजन को खाते हुएबदबुदार पानी को पीते हुएऐसी सब्जी खाते हुए जिसमें कीड़े-मकौड़े साँप की बोटियाँ निकलती खालकोठरी की यातनाएं सहते हुयेकई-कई बार 6-6 महीने एकान्त सहते हुएभयंकर बुखार में भी काम करते हुएकोल्हू पेरते हुयेभारत माता के सम्मान  स्वाभिमान के लिए अपना जीवन लगा दिया।
          उस खुरदरे फर्श परउस कोठरी में जिसके दरवाजे सवा इंच मोटी मजबूत इस्तपात की सलाख से बने थे। हवा के लिये 8 फिट ऊपर  13 Feet X  2 Feet का रोशनदान थाजिसमें सायं 5 बजे से सुबह 8 बजे तक टीन के एक छोटे डिब्बे में मल-मूत्र त्याग करके उसी की बदबु  के पास बैठने की मजबूरी होती थी। मिट्टी  कीड़ों वाली रोटी खाकरजब काम पूरा नहीं होता था तो वह भी नहीं मिलती थीमात्र 200 ग्राम या 2 कटोरी पके चावल का पानी दिया जाता था ताकि वह मरे भी नहीं और जिन्दा रहे तो तिल-तिल करकेवो सारी यातनाएं स्मरण हो आयीमन किया कि एक रात सावरकर जी की कोठरी में रहकर भारत माता का चिन्तन करूं। लेकिन यह सम्भव  था।
l      उसी इन एक नजदीक के गाँव में गये तथा  फिर वहाँ से सायं को एक गाँव के योग कक्षा में गये।
l        रात को लाईट  साऊण्ड शो देखा उसमें विस्तार पूर्वक अण्डमान की कहानी कहीं गयी।
           अगर भारत को विश्वगुरू बनाना है तो हिन्दुस्तान के हर बच्चे को ‘‘,,’’सीखाने से पहले कालापानी दिखाना चाहियेहर बच्चे को शहीदों के जीवन से परिचय करवाना चाहिये।
l   आज की अण्डमान के 10 से ज्यादा द्वीपों के नाम अंग्रेजों के नाम पर रखे गये हैं। जैसे हैवलाव   इत्यादि।
l     वहाँ का प्रशासन शहीदों की याद को मिटाने में जुटा है वहाँ पर एक आईलैण्ड है जहाँ क्रान्तिकारियों को फांसी दी जाती थीवहीं पर आईलैण्ड की सरकार ने होटल बनाने के लिए किसी विदेशी कम्पनी को देने की तैयारी कर ली हैभारत स्वाभिमानअण्डमान उसकी आवाज उठा रहा है।
l        अण्डमान में कालेज का नाम नेहरु के नाम पर जो वहाँ पर कभी नहीं आयावहाँ के अनेकों संस्थानों का नाम महात्मा गांधी के नाम पर रखा गया है।
l        अण्डमान में आवास करते हुए लेखक को जब पहले दिन रात को एक बार लाईट चली गयी तो कमरे का दरवाजा खोलना पड़ा तो बहुत से मच्छर  गये उन्होंने 15 मिनट में ही बहुत सी जगह काट खाया, 10 मिनट में ही अहसास हुआ कि बिना बिजली के क्या होता है हमारे क्रान्तिकारियों ने तो बिना बिजली के मच्छरों में अपने मल-मूत्र के पास पूरी जवानी गुजार दी।
l       अगले दिन रात को बिस्तर पर कुछ गिर गया तो सोते समय 4 इंच के मोटे गद्दे पर कुछ चिटियाँ  गयीं थीं जिन्होंने 1 बजे तक सोने ही नहीं दियातो हमारे उत्तर-पूर्व के केन्द्रीय प्रभारी सुब्रतो जी का दरवाजा खटखटाकर मुझे उनके कमरे में जाकर सोना पड़ा।
                कुछ मच्छरोंकुछ चिटियों के कारण मुझे जब 4 इंच के गद्दे परबेड पर अच्छी बिजली वाले कमरे में 15 मिनट में तकलीफ हुई तो अन्दाजा लगा सकते हैं हमारे क्रान्तिकारियों ने तो काल कोठरी की जेल के खुरदरे फर्श पर जाने कितनी चिटियों ने काटा होगाजाने कितनी धूप-बरसात सहन की होगीकितनी यातनायें सही हैं तब हमें आजादी मिली है। उनको मेरा नमन है!
                अण्डमान का मौसम समुद्र के किनारे होने से वहाँ पर बरसात खूब होती है और गर्मी भी खूब पड़ती हैसूखी गर्मी नहीं पड़ती चिपचिपी गर्मी पड़ती है उसमें एक-एक पल काटना मुश्किल होता है। हमारे क्रान्तिकारियों को उस समय कई-कई दिन में नहाने दिया जाता था वह भी समुद्र के खारे पानी सेसमुद्र का पानी भी बहुत थोड़ी मात्रा में क्योंकि उसको जेल तक ढ़ोकर कौन लायेकैदियों को समुद्र के पास जाने नहीं देते थे।
                समुद्र के पानी में नहाकर हालत बहुत खराब होती थीक्रान्तिकारियों को कोल्हू पेरना  उतना तेल निकालना जितना एक बैल निकालता था।
                                                ऐसी त्याग  बलिदान की भूमि को नमन है...! 
(राकेश कुमार)
9760095214